Friday, February 7, 2014

" जीवन-कविता "

मैंने तुम्हारी कविता को
पाला पोसा और बड़ा किया
शब्दों को जोड़-जोड़ के
नया विषय मीनार खड़ा किया
ढूंढ-ढूंढ के लायी लहर संवाद
हर्फ़ की हर सतह को हरा किया

मैंने तुम्हारी कविता को
पाला पोसा और बड़ा किया…

कलम लगाया नम्र संवेदनाओं का
सोच की ज़मीन को झरझरा किया
जगा दिया मानवता के सोये पहरी को
आवाज़ कि लय को इतना कड़ा किया
पतझड़ को समझाया बसंत कि खूबी
सावन के नाम पानी का दरिया किया
लू की थपेड़े सहन की क्षमता भर दी
हवाओं का आँचल खुशबुओं से जड़ा दिया 

मैंने तुम्हारी कविता को
पाला पोसा और बड़ा किया…..

राहों को भेट में दे दिए पहिये मैंने
पेड़ो से फुटपाथों का सीना चौड़ा किया
चट्टानों का ठूँठ-ह्रदय चीर निकाला दरिया मैंने
दुल्हन प्राकृति का रंग-रूप सुनहरा किया
पोखरा का गोद भर दिया पानी से
ओस कि बूंदो को मोती बना दिया
सूरज के सर पे रख दिया सेहरा
चाँद का नूर बेदाग़ अप्सरा किया

मैंने तुम्हारी कविता को
पाला पोसा और बड़ा किया!!


 
रचनाकार : परी ऍम श्लोक

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