Tuesday, March 4, 2014

"तुम हो कर भी कहीं नहीं हो"

कभी जाना नही था मैंने
कि सेहरा में भी
सागर का बसर होता है....

सरग़ोशियो कि मद्धम चाल के साथ
किसी कि खुशबु ऐसे भी
इतनी तेज़ चलती होगी..
आलम ये फ़ज़ा किसी का बेखुदी में
इसकदर जिक्र करते होंगे..
सन्नाटे यूँ किसी कि
तारीफ में मशगूल होकर
अपनी खामोशियाँ तक भूला देते होंगे..
किसी कि नज़र
सूरज कि लपटो से ज्यादा
रोशन कर सकती होगी
जिंदगी में पसरे हुए
बरसो के जिद्दी अँधेरे को...

तुमसे मिलके..
कई अज़ीब सवालो के
खोये जवाबो को
तहो के नीचे से निकाल लिया मैंने
अब सब कुछ सुलझा है
कहीं कोई सिलवट नही
कोई गुरेज़ कि दीवार नहीं
बस कुछ फासले फैसलो के हैं..
 
टीस तो सिर्फ इस बात कि है मुझे
कि तुम हर जर्रे में शामिल हो
मगर
तुम हो कर भी कहीं नहीं हो

मैं अभी भी
एहसासो के तलातुम में डूबी हूँ
उससे उभरी तक नहीं
और
तुम्हारी याद बार-बार लगातार
इसकी उफान को हवा देती रहती है !!


रचनाकार : परी ऍम श्लोक

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